Poems

काली

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पूछो काली रतियों से, वो रंग कहाँ से लाती हैं ?
क्या छू कर तेरे कजरे को श्याम रंग हो जाती हैं ?
ज़ुल्फ़ घनेरे मेलों में, वो बच्चों सी खो जाती हैं
या रजनीगंधा के उबटन से, तन अपना गमकाती हैं
पूछो काली रतियों से, वो रंग कहाँ से लाती हैं ?

बादल काले गरज रहे हैं, अखियाँ काली-काली हैं
अस्मत को रो रही ‘द्रौपदी’, मूक सभा भी काली है
बहा ‘कर्ण’ गंगा में देखो, ममता ‘कुन्ती’ की काली है
पूछो काली रतियों से, क्या रंग यहीं से लाती हैं ?

जकड़ रही ‘पृथ्वी’ को देखो, ‘ग़ोरी’ की रस्सी काली है
‘ख़िलजी’ की मुझको नियत भी, कुछ दिखती काली-काली है
सन सत्तावन हम हार गए, गद्दार की बातें काली हैं
पूछो काली रतियों से, क्या रंग यहीं से लाती हैं ?

नेताजी के चेहरे पर, छिड़की स्याही काली है
ऑक्सीजन से सस्ती बिकती, नोट हमारी काली है
काली है ‘बाबा’ की कुटिया, ‘भक्तों’ की भक्ति काली है
वर्षों से अभियान चल रहा, माँ ‘गंगा’ फिर भी काली हैं
पूछो काली रतियों से, क्या रंग यहीं से लाती हैं
?
पूछो काली रतियों से, क्या रंग यहीं से लाती हैं ?

(गरिमा सिंह- परस्तिश)

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