Poems

जरा सोचो

तुम आधिकारों की बात करो वे कर्त्तव्य तुम्हें सिखलाते हैं। तुम संवैधानिक रस्तों पर कर्म करो वो तुम्हें कुचलते जाते हैं। क्या इस दिन खातिर लोकतंत्र का ढांचा खड़ा किया होगा लोकतंत्र में लोग न खुश हो तो कैसा लोकतंत्र…

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